^दिल के टुकड़े मजबूर करते है कलम चलाने को वरना...
हक़ीक़त में कोई भी खुद का दर्द लिखकर खुश नही होता..
^मैं तो बस एक मामूली सा सवाल हूँ “साहिब..!
और लोग कहते हैं.. तेरा... कोई जवाब नहीं....!!!!
^दर्द हल्का है,
साँस भारी है,
जिए जाने की
रस्म जारी है...
^शौंक नहीं है मुझे अपने जज़्बातों को यूँ सरेआम लिखने का …
मगर क्या करूँ ,
अब जरिया ही ये है तुझसे बात करने का..........
^एक मुट्ठी इश्क़ बिखेर दो इस ज़मीन पे,
बारिश का मौसम है शायद मोहब्बत पनप जाए।
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