है बोझ ज़िंदगी सिर से उतर जाने दो



❛है बोझ ज़िंदगी सिर से उतर जाने दो 
बेवजह जी रहे हैं आज तो मरजाने दो।

बांध कर मैंने उम्मीदों क कारवां रखा 
यहां कोई नहीं अपना ये गुज़र जाने दो ।

सूखी आंखो का रोना नज़र नहीँ आता
मेंरी आंखों में ये शैलाब उतर आने दो।

मैनें खुदको समेंट रखा है तेरी यादों में
यादों के आईनें में हमको संवर जाने दो।

हम संभल जाएंगे हालात सम्हलने तो दे
आज दामन से ख़ुशियों को मुक़र जाने दो।

मुझे न राह दिखाओ यूं  मंज़िल की मेरी 
जहां ले जाए ये ज़िंदगी उधर जाने दो ।

एक दिन दिल की दबी आह सुनाई देगी
दर्द से दिल हमारा और भी भर जाने दो ।

हम रहे या न रहे जानिब सदाएं गूजेँगी
सुनो आइना सी टूटी हूं बिखर जाने दो ।❜

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