कितनी बार बोला है तुम्हें
मत आया करो मेरे ख्वाबों में,
मेरी रात भर जगने की आदत से
बैर है क्या तुम्हारा।
जानती हो ना
कि सारा दिन तो मसरूफियत में
निकल जाता है,
इक रात ही तो होती है
बिल्कुल तन्हा अकेली मेरी तरह।
खैर तुम कहाँ मानने वाली हो
जाओ करो अपनी ज़िद पूरी।
अब तो बेचारा चाँद भी तरसता है,
वहीं आसमान पे
टंगा रहता है रात भर।
कितनी अच्छी कटा करती थी
हम दोनों की बातें,
कभी मैं चाँद से तुम्हारी बात करता
तो कभी चाँद इतराकर
मुझ पे चाँदनी उछाल देता,
मगर जिस दिन से
तुम्हारा मेरे ख्वाबों में
आने का सिलसिला सा
शुरू हुआ है ना
मेरी तो सारी कल्पना ही
मुझसे जैसे छिन सी गई है,
लफ़्ज़ रूठ से गये हैं,
लहजे ने भी
नखरे से दिखाने शुरू
कर दिये हैं।
"मेरी हर ख्वाहिश तुमसे शुरू होकर तुमपे ही खत्म हो,
मेरी चाहत का तुम हो खज़ाना तन्हाई की बज़्म हो।"
©® दिनेश शर्मा
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