अजी हम कभी ग़म के मारे न होते
अगर दूसरों के सहारे न होते
नदी मस्त बलखाती चलती नहीं गर
उसे थामने को किनारे न होते
फ़लक़ का ज़मीं से जो रिश्ता न होता
सितारे भी रौशन हमारे न होते
भला एक लम्हा गुज़रता तो यूँ जब
मेरे पास शिक़्वे तुम्हारे न होते
कभी भी मुहब्बत न परवान चढ़ती
जो हम जीत कर दाँव हारे न होते
है ग़ाफ़िल नहीं क्या ये मुमक़िन कभी के
सिसकते से हर सू नज़ारे न होते
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