मैं रह कर खामोश भी बोलता रहा।
जमाना जबां से जहर घोलता रहा।
मेरे लफ्ज थे तरबतर सच से सारे,
वो झूठ के तराजुओँ मेँ तोलता रहा।
मैँ सही था मुझे खामोश रखा गया,
वो गलत था जोर से बोलता रहा।
डाल बंदिशोँ के कंगन मेरी जुबान मेँ,
कातिल मेरी बस्ती मेँ डोलता रहा।
बेच के लाज भी खामोश पानी तेरा,
बेदाग था मैँ पर खून खौलता रहा।
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