कभी यूँ मिलें कोई मसलेहत, कोई ख़ौफ़ दिल में ज़रा न हो,

कभी यूँ मिलें कोई मसलेहत,

कोई ख़ौफ़ दिल में ज़रा न हो, 

मुझे अपनी कोई ख़बर न हो! 

तुझे अपना कोई पता न हो 

वो फ़िराक़ हो या विसाल हो! 

तेरी याद महकेगी एक दिन 

वो ग़ुलाब बन के खिलेगा क्या,

जो चिराग़ बन के जला न हो! 

 कभी धूप दे, कभी बदलियाँ, 

दिलो-जाँ से दोनों क़ुबूल हैं, 

मगर उस नगर में न क़ैद कर, 

जहाँ ज़िन्दगी का हवा न हो! 

 वो हज़ारों बाग़ों का बाग़ हो, 

तेरी बरक़तों की बहार से, 

जहाँ कोई शाख़ हरी न हो, 

जहाँ कोई फूल खिला न हो! 

 तेरे इख़्तियार में क्या नहीं, 

मुझे इस तरह से नवाज़ दे, 

यूँ दुआयें मेरी क़ुबूल हों, 

मेरे दिल में कोई दुआ न हो! 

 कभी हम भी जिस के क़रीब थे, 

दिलो-जाँ से बढ़कर अज़ीज़ थे, 

मगर आज ऐसे मिला है वो, 

कभी पहले जैसे मिला न हो!

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