बस चन्द करोड़ों सालों में सूरज की आग बुझेगी जब

बस चन्द करोड़ों सालों में

सूरज की आग बुझेगी जब

और राख उड़ेगी सूरज से

जब कोई चाँद न डूबेगा

और कोई जमीं न उभरेगी

तब ठंढा बुझा इक कोयला सा

टुकड़ा ये जमीं का घूमेगा

भटका भटका

मद्धम खकिसत्री रोशनी में!

मैं सोचता हूँ उस वक्त अगर

कागज़ पे लिखी इक नज़्म कहीं उड़ते उड़ते

सूरज में गिरे

तो सूरज फिर से जलने लगे!!

टिप्पणियाँ