जब भी इस शहर में कमरे से मैं बाहर निकला मेरे स्वागत को हर इक जेब से ख़ंजर निकला l

जब भी इस शहर में कमरे से मैं बाहर निकला 

 मेरे स्वागत को हर इक जेब से ख़ंजर निकला l 


मेरे होंटों पे दुआ उस की ज़बाँ पे गाली 

 जिस के अंदर जो छुपा था वही बाहर निकला l


ज़िंदगी भर मैं जिसे देख कर इतराता रहा 

 मेरा सब रूप वो मिट्टी का धरोहर निकला l 


रूखी रोटी भी सदा बाँट के जिस ने खाई 

 वो भिकारी तो शहंशाहों से बढ़ कर निकला l 


 क्या अजब है यही इंसान का दिल भी 'नीरज' 

 मोम निकला ये कभी तो कभी पत्थर निकला l

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